नेपाल में राजशाही की बढ़ती गतिविधियों से सियासी हलचल तेज

ओली चीन के करीब, प्रचंड ने फिर उठाया नरसंहार का मुद्दा

नीलू दुबे, महराजगंज। नेपाल में राजशाही समर्थकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए लोकतांत्रिक दलों ने अपनी पुरानी रणनीतियों को दोबारा अपनाना शुरू कर दिया है। माओवादी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड ने राजपरिवार नरसंहार के मुद्दे को हवा देने की कोशिश की, जबकि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के बहाने चीन से नजदीकियां बढ़ाने का प्रयास किया। हालांकि, अब नेपाल के लोग, विशेष रूप से मधेसी समुदाय, इन दलों की रणनीतियों को महत्वहीन मानने लगे हैं।


25 साल बाद भी नहीं सुलझा राजपरिवार नरसंहार मामला

नेपाल में लगभग 25 साल पहले हुए राजपरिवार नरसंहार की सच्चाई अब तक सामने नहीं आ सकी है। जब प्रचंड पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तब भी इस मामले की जांच नहीं की गई और इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।


प्रचंड का आरोप: "ज्ञानेंद्र स्वर्ण माफिया"

हाल ही में नेपाल-चीन सीमा पर सिंधुपाल चौक में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में प्रचंड ने मौजूदा नरेश ज्ञानेंद्र विक्रम शाह को नरसंहार के लिए दोषी ठहराया और उन्हें "स्वर्ण माफिया" तक कह दिया। हालांकि, नेपाली जनता इसे राजनीतिक चाल समझ रही है।

वहीं, ओली बीआरआई के बहाने चीन के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में कास्ठमंडप संवाद में उन्होंने नेपाल-चीन के प्रगाढ़ संबंधों को लेकर कई बयान दिए।


योगी आदित्यनाथ के पोस्टर से घबराई ओली सरकार

नेपाल मामलों के जानकार यशोदा श्रीवास्तव के अनुसार, ओली सरकार की यह प्रतिक्रिया हाल ही में काठमांडू के नारायणहिटी राजदरबार के सामने ज्ञानेंद्र विक्रम शाह के समर्थन में उमड़ी भारी भीड़ के बाद आई है।

इससे पहले, नेपाल में योगी आदित्यनाथ के समर्थन में पोस्टर लहराए जाने से ओली सरकार पहले से ही असहज थी। ओली सरकार अब मधेसी इलाकों में चीन समर्थक विचारधारा के प्रचार में जुट गई है।

हालांकि, नेपाल में अधिकांश विकास कार्य भारत के सहयोग से ही चल रहे हैं, जिसमें यातायात, कृषि और शिक्षा से जुड़ी कई परियोजनाएं शामिल हैं।


आनंदीबेन पटेल ने नेपाल के छात्रों का किया समर्थन

17 मार्च को यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल नेपाल से सटे भारतीय जिलों महराजगंज और सिद्धार्थनगर के दौरे पर थीं। उन्होंने सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में कहा कि यह संस्थान नेपाल के विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन रहा है।


नेपाल में राजशाही को लेकर बढ़ते समर्थन से लोकतांत्रिक दलों की बेचैनी साफ झलक रही है। आने वाले दिनों में नेपाल की राजनीति और अधिक उथल-पुथल भरी हो सकती है

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